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विपक्ष को एकजुट करता राहुल एपीसोड…

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विपक्ष को एकजुट करता राहुल एपीसोड…

राहुल गांधी की लोकसभा से सदस्यता खत्म होने और एक माह में सरकारी आवास खाली करने का नोटिस विपक्षी दलों की एकजुटता में संजीवनी साबित हो रहा है। तृणमूल कांग्रेस जो राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा रही थी, वह भी अब कांग्रेस के नेतृत्व में एक मंच पर आ गई है। हालांकि जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने द्वारा तैयार किए गए हितग्राहियों के सुरक्षा कवच पर अटूट भरोसा है, उससे लोकसभा चुनाव में यह समूचा विपक्ष भी बौना साबित हो सकता है। फिर भी मतदाताओं के दिल और दिमाग में ऐसे एपिसोड स्थायी घर बना लेते हैं। और जब वक्त का पहिया घूमता है, तो यह ऐसे विपक्ष के लिए भी संचित पूंजी का परिणाम साबित होता है।
इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब वक्त का पहिया घूमा तो ढेर सारी उपलब्धियां भी काम नहीं आईं। इक्कीसवीं सदी में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई सरकार को मतदाताओं द्वारा नकारने का उदाहरण सबके सामने है। जब सब कुछ अच्छा होने के बाद भी एनडीए सरकार की सत्ता में वापसी संभव नहीं हो सकी थी। पर विपक्षी दलों के सदस्यों के साथ भी लोकतांत्रिक दायरे में अटल जी विरोध की भाषा बोलते और आक्रामकता के साथ आक्रोशित होते दिखे हों, लेकिन उनके मन में सह्रदयता और सद्भाव भी सदैव हमेशा उर्वर होता रहा और उसका ही नतीजा था कि उनके सम्मान में कभी भी कमी नजर नहीं आई। पर अटल बिहारी वाजपेयी के बाद की इक्कीसवीं सदी की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जिसमें अटल की सोच और आचरण का कोई कोना अस्तित्व में नजर नहीं आता। शायद यह वही दौर है, जिसमें महात्मा गांधी के आगे नतमस्तक तो सभी हैं, पर महात्मा गांधी की सोच पर अमल करने को कोई तैयार नहीं है। और अब तो भाजपा में भी ऐसा लगता है कि अटल जी की जगह की भरपाई के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है।
विपक्ष को एकजुट करता राहुल एपीसोड...
लगभग दस दिन पहले ही ममता बनर्जी ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सीधा हमला बोला था। उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े करते हुए कहा था कि राहुल गांधी विपक्ष के लीडर बने रहे तो नरेंद्र मोदी को कोई नहीं हरा सकता। पीएम मोदी के लिए राहुल गांधी टीआरपी की तरह हैं। तो अब राहुल एपीसोड ने मोदी की टीआरपी का एक विकेट ढहा दिया है। ममता के बयान पर भरोसा करें तो यह साफ तौर पर दिख रहा है कि घाटा किसको हुआ है। हालांकि भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी कुछ ज्यादा फॉर्म में नजर आ रहे थे और यात्रा के दौरान वह पिछले सत्र में भी गैरहाजिर ज्यादा रहे थे। अब राहुल एपीसोड ने यह साफ कर दिया है कि अब यात्रा का दूसरा चरण वह बेफिक्री से पूरा कर सकते हैं।
वैसे तो राहुल गांधी भी खुद को महात्मा का अनुयायी ही मानते हैं, पर माफी मांगने पर वह महात्मा की सोच से तालमेल बिठाने को कतई तैयार नहीं हैं। यह भी एक तरह का विरोधाभास है। मंझे हुए राजनेता तो मानहानि भी सोच समझकर करते हैं, लेकिन राहुल गांधी वैसे राजनेताओं में भी खुद को शामिल नहीं कर पाए हैं। पर यह भी मानना पड़ेगा कि इस लोकसभा सत्र में राहुल गांधी बड़े आक्रामक होने के बाद भी जोश और होश में संतुलन बनाए रखने में सफल रहे थे और शायद इसीलिए उन्हें सत्ता पक्ष की नजर लग गई। खैर राजनीति में ऐसे दौर आते ही रहते हैं और उनकी दादी इंदिरा गांधी की सदस्यता खत्म होने का उदाहरण भी उनके सामने है। अब भले ही सत्ता न मिले, पर राहुल गांधी एक नेता के बतौर स्थापित तो हो ही गए हैं। हो सकता है कि चुनाव लड़ने को मिले, तो अब अमेठी के मतदाताओं की सहानुभूति भी उन्हें हासिल हो जाए। नहीं तो प्रियंका गांधी वाड्रा ही चुनाव मैदान में उतरकर सक्रिय राजनीति की शुरुआत कर दें।
Gujarat CM
वैसे मोदी-शाह के लिए यूपीए सरकार का दौर बहुत कठिन साबित हुआ था। न्यूटन का गति का तृतीय नियम वर्तमान राजनीति पर आंशिक बदलाव के साथ पूरी तरह लागू हो रहा है। नियम कहता है कि ‘प्रत्येक क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है।’ यह सोचना ज़रूरी है कि क्रिया और प्रतिक्रिया हर समय दो अलग वस्तुओं पर लागू होती है। गति का तृतीय नियम यह इंगित करता है कि जब एक वस्तु किसी दुसरे वस्तु पर बल का प्रयोग करता है, तत्क्षण ही वह दूसरा वस्तु पहले वस्तु पर वापस बल लगाता है। प्रयोग किए गए दोनों बल परिमाण में बराबर होते है,पर दिशा में विपरीत। राजनीति में ‘तत्क्षण’ शब्द की जगह यह माना जा सकता कि एक दल की सरकार के समय विपक्ष के साथ जो क्रिया होती है, तो वह दूसरा दल जब सत्ता में आता है तब प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
हालांकि यह साफ है कि यह बल दो विभिन्न दलों पर लगाए जाने के कारण वह एक दूसरे को रद्द नहीं करते। इस प्रकार न्यूटन के गति का तृतीय नियम दो वस्तुओं के अलावा दो दलों पर  भी बल के पारस्परिक प्रभाव के बीच के बंधन का वर्णन करता है। फर्क इतना है कि क्रिया की प्रतिक्रिया के समय में अंतर लंबा हो सकता है। और फिलहाल भारतीय राजनीति न्यूटन के तीसरे नियम में आंशिक संशोधन के साथ ही गतिमान है। यह उदाहरण भी बहुत सटीक है कि एक बन्दूक से जब एक गोली चलती है, तब बन्दूक से आगे की ओर गोली  पर एक बल प्रयुक्त होता है। इसे क्रिया बल कहते है। गोली भी बन्दूक पर पीछे की ओर बराबर बल प्रयोग करती है। इसे प्रतिक्रिया बल कहते हैं। बन्दूक के बड़े द्रव्यमान के कारण बन्दूक चलाने वाले आदमी के कंधे पर पीछे की ओर सिर्फ एक झटका लगता है। और यही झटका राहुल गांधी को सदस्यता खत्म होने के रूप में लगा है। पर झटका लगने से फिलहाल तो सकारात्मक असर विपक्षी दलों के एकजुट होने के रूप में नजर आ रहा है। हालांकि मोदी-शाह के तूणीर में हर तरह के बाण हैं, जो जरूरी होगा उसको संधान कर इस समस्या का समाधान भी निकाल ही लिया जाएगा…।