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पान मसाले वाली चाय जैसी -‘शहजादा’

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अपने ‘गवालियर‘ वाले डॉक्टर तिवारी का छोरा कार्तिक तिवारी (आर्यन) अपनी गिरह के पैसे लगाकर शहजादा बना है, जो तेलुगू में अल्लू अर्जुन की सुपरहिट फिल्म ‘अला वैकुंठपुरमलो’ की रीमेक है। अब कार्तिक तो ठहरा कार्तिक! वह न तो अल्लू बन सकता है, न सल्लू ! हाँ, दर्शकों को उसने उल्लू बनाने की कोशिश ज़रूर की है। वो भी बना नहीं पाया।

यह फिल्म ऐसी चाय जैसी है, जिसमें चाय मसाला की जगह पान मसाला डाल दिया गया हो। इस मसाला चाय में हींग का काम किया है निर्देशक ने, जो डेविड धवन के साहबज़ादे रोहित धवन हैं, जिन्होंने कार्तिक को गोविंदा बनाने की पूरी कोशिश की। शुरुआत में ही बच्चों की अदला-बदली सलीम जावेद की पुरानी फिल्मों की याद दिलाती है। इससे दर्शक के मन में पूरी फिल्म का खाका बन जाता है कि आगे क्या-क्या हो सकता है। फिर वैसा ही होता चला जाता है।

कुल मिलाकर यह ऐसी फिल्म बन गई है, जिसकी कॉमेडी देखकर हंसी तो क्या, मुस्कुराहट भी नहीं आती ! उसके फाइटिंग सीन देखकर झपकी आने लगती है और फैमिली ड्रामे को देखकर आँखों से आंसू सूख जाते हैं। इमोशनल सीन च्युइंग गम की तरह खिंचे चले जाते हैं! और रोमांस गुदगुदाता नहीं है। हां, कार्तिक को डांस करना अच्छा आता है तो वह हर मौके-बेमौके नाचने लगता है।  गानों में खूब धन बहाया गया है, जो उबाऊ हैं। प्रीतम प्यारे का संगीत ढेंचू है।

कार्तिक आर्यन इस फिल्म के  निर्माता भी हैं, इसलिए इस फिल्म के हर सीन में कार्तिक ही कार्तिक हैं! थोड़ी बहुत जगह मनीषा कोइराला,  रोनित राय, सनी आहूजा, अंकुर राठी, सचिन खेडेकर, राजपाल यादव और  राकेश बेदी आदि को भी दे दी गई है! कृति सनोन ठीक ही लगी। सरदार जैसी फिल्म में वल्लभ भाई पटेल का दमदार रोल निभाने वाले परेश रावल फोकट खर्च हो गए। पद्मश्री से सम्मानित कलाकार को सोच समझकर भूमिकाएं स्वीकारनी चाहिए। 

शहजादा  10 फरवरी को लगना थी, लेकिन पठान के डर से एक हफ्ते बाद रिलीज़ की गई। फिर भी फिल्म को कोई बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा हो, ऐसा नहीं लगता। तीन साल पहले आई मूल तेलुगू फिल्म 200 करोड़ रुपए से ज्यादा कमा चुकी है, लेकिन यह फिल्म 100 करोड़ का धंधा भी कर ले तो भी बहुत है! 

 
एक औसत चालू फिल्म है, जिसे देखने के लिए कोई बात प्रेरित नहीं करती!