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महिला दिवस विशेष: संस्कार, समर्पण, वात्सल्य और स्वाभिमान के इर्द-गिर्द घूमता नारी जीवन!

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महिला दिवस विशेष: संस्कार, समर्पण, वात्सल्य और स्वाभिमान के इर्द-गिर्द घूमता नारी जीवन!

– शिल्पा दीक्षित

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महिला एक शक्ति का प्रतीक है। वो झोपड़ी को महल बना सकती है और उसके कदम चाहें तो महल को हिला सकती है। महिला चाहे गृहिणी हो या कामकाजी वह समय-समय पर अपनी विशिष्टता को प्रदर्शित करने का मौका नहीं चूकती। संस्कार ग्रहण कर वह उसके आने वाली संतति को संस्कारित करती है और उससे ही योग्य समाज का निर्माण होता है। नारी ही नैतिक आदर्शों की संरक्षिका रही है। नारी की त्यागशीलता की बराबरी आखिर कौन कर सकता है।

हम वैदिक काल की बात करें तो हमें गर्व होता है कि हमने एक ऐसे देश में जन्म लिया, जिसमें शास्त्रार्थ, समसामयिक और जगतगुरु शंकराचार्य को पराजित करने वाली भारती देवी ने जनक की सभा में याज्ञवल्क्य को चुनौती देने वाली वाचाकनवी गार्गी ने, कालिदास के समकालीन देश भर के विद्वानों को धूल चटाने वाली विद्योत्तमा ने, युद्ध क्षेत्र में बड़े-बड़े शूरवीरों के दांत खट्टे करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई एवं दुर्गावती जैसी देवियां, बीजगणित को जन्म देने वाली लीलावती, अपने सतीत्व की रक्षार्थ स्वयं अकेले नहीं अपितु 16000 देवियों को लेकर जीवित चिता दहन करने वाली देवी और पन्नाधाय को कौन भूल सकता है जिसने उदयपुर के राणा की रक्षा के लिए अपने इकलौते पुत्र को समर्पित कर दिया था।

इस देश की नारी और उसका त्याग, बलिदान, संयम, धैर्य और उसका चरित्र दूसरे लोगों से उसे अलग बनाता था। यह गर्व का विषय है कि आज भी कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां नारी न पहुंची हो। चंद्रयान-3 लॉन्च हुआ, दुनिया ने देखा कि उसमें भी नारी शक्ति का योगदान रहा। घर के कामकाज से लेकर राष्ट्रपति पद तक उसका योगदान है। ये चार विशेषताएं महिलाओं गहना है। संस्कार, समर्पण, वात्सल्य और स्वाभिमान। इन चारों के इर्द-गिर्द नारी का जीवन घूमता रहता है। पुत्री के रूप में वह संस्कार ग्रहण करती है परिवार में माता-पिता उत्तम उत्तम शिक्षाएं देकर संस्कार देते हैं। नारी एक नहीं दो कुलों की लाज होती है इसलिए नारी की जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है।

पत्नी की भूमिका में आने पर उसके जीवन में समर्पण शुरू होता है। आज परिस्थितियों बदल गई है। आज महिलाओं को अधिकार सिखाए जाते हैं। जबकि, यहां तो कर्तव्य बोध सिखाया जाता था और अधिकार से न परिवार बचे न समाज। अधिकारों की भाषा हटकर जहां कर्तव्य का बोध सिखाया जाता है वह घर, वह समाज आगे बढ़ता है और इस घर और समाज में स्वर्ग हुआ करता है। नारी मां के रूप में वात्सल्य बिखेरती है। मां की महिमा तो सबसे निराली है, उसी के चरणों में स्वर्ग है, मां गूंगे का खाया वह गुड़ है, जिसे चखा तो जा सकता है परंतु व्यक्त नहीं किया जा सकता। आज जगह-जगह वृद्ध आश्रम खुल गए हैं। इसका कारण यह है की माताओं ने सुविधाएं तो सारी दी, बच्चों की आवश्यकताएं तो पूरी की, परंतु उन्हें जो देना चाहिए था नहीं दिया। उन्होंने कार तो उन्हें दी परंतु संस्कार नहीं दे सकी। यदि संस्कार दिए होते तो वृद्ध आश्रम में नहीं रहना पड़ता।

श्रवण कुमार और राम के देश में वृद्ध आश्रम बड़े दुख की बात है आज नारी उन्हें संस्कार नहीं दे पा रही है। आज आप बचपन से ही घर में अच्छे-अच्छे श्लोक सिखाते, सुनाते, वेदों के मंत्र सुनाते, प्रार्थनाएं सुनाते हैं तो उन सबका प्रभाव बच्चों पर पड़ता और वह चरित्रवान और संस्कारवान बनते हैं। 16 संस्कार माता के गर्भ से ही शुरू होते हैं। बार-बार कोई चीज जब सुनाई जाए तो वह वेद, संस्कार बच्चों के दिल दिमाग पर अवश्य प्रभाव डालते हैं। सुनने का बहुत प्रभाव होता है इसलिए आपको संस्कार देना चाहिए जो केवल एक मां ही दे सकती है।

नारी है न हारी है न हारेगी। स्वाभिमान का गुण आने पर वह अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ बड़े बड़ों से लड़ जाती है। आज सुविधा हमारे पास बहुत है। नारी हर क्षेत्र में आगे है। लेकिन, हमने अपनी उन्नति का आधार माना वस्त्र कम पहनाना, संयुक्त परिवार से पृथक रहना, अपने बड़ों की सेवा नहीं करना। इसे हम आज उन्नति कहते हैं। आप कितने भी बड़े पद पर पहुंच जाएं बहुत कुछ हासिल कर लें लेकिन आपकी संतान हाथ से चली गई तो आपका बलिदान खाली जाएगा। जब जिम्मेदारियां का बोझ परिवार पर पड़ा तो बेटियां ऑटो रिक्शा और ट्रेन चलाने लगी। साहस के साथ अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि ली। वायुयान और फाइटर जेट भी उड़ाने लगी। न जाने कितने उदाहरण है जहां बेटियां हर क्षेत्र में शक्ति आजमाने लगी। अब तो बेटियां वीरों की शहादत पर अर्थी को कंधा देकर अब श्मशान भी जाने लगी।

जिन घरों में नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। इसलिए नारी ही नैतिक आदर्शों की संरक्षिका रही है। पुत्री बनी तो पितृ कुल की कीर्ति चाहती रही, भगिनी बनी तो भाई की चिरायु मांगती रही, जब पत्नी बनी तो मांग में सिंदूर भर लिया, मंगल कामना से जीवन को यज्ञ सा बना लिया, मां बनी तो संतति की आपदा सारी हर ली। नारी की त्यागशीलता की बराबरी आखिर कौन कर सकता है। लेकिन, नारी को अपना वैशिष्ट्य बनाए रखना होगा। लोग कहते हैं स्त्री और पुरुष बराबर है। स्त्री पुरुष के सिर की पगड़ी है। लेकिन, नारी की तुलना तो किसी के साथ नहीं हो सकती। क्योंकि, नारी मां होती है और मां के साथ तुलना कैसे हो सकती है। जरूरत पड़ने पर वहां देश को भी चलाती है। यही कहा जा सकता है कि नर के मन से नारी का सम्मान नहीं जा सकता है, इस धरा से मातृशक्ति का मान नहीं जा सकता है। बेटा घर में हो तो बेशक चूल्हा ठंडा रह जाए, बेटी घर में हो भूखा मेहमान नहीं जा सकता।