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54.In Memory of My Father-पिताजी भोपाल गैस त्रासदी से बाल बाल बचे थे ,बस छूट गई थी उनसे !

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पिता को लेकर mediawala.in में शुरू की हैं शृंखला-मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता। इस श्रृंखला की 54 th     किस्त में आज हम प्रस्तुत कर रहे है, धार की लेखिका वंदना दुबे को। वंदना समसामयिक विषयों पर तो लिखती ही है वे लघु कथा भी लिख रही है ,अध्यापन में लम्बे समय तक जुटी रही है. उम्र के हिसाब किताब उपर वाले के ही बही खाते होते हैं तभी तो  उनके पिताजी भोपाल त्रासदी वाले दिन भोपाल का टिकिट ले लेने के बावजूद बस नहीं पकड पाए थे और इस तरह से उनका जीवन बच गया उन्हें शायद भगवान पशुपति नाथ ने दर्शन देने के बहाने भोपाल की जगह मंदसौर बुला  लिया था, लेकिन संयोग देखिये उस दिन उनका जीवन शेष था तो वे बच गए थे लेकिन  उस घटना के इकतीस साल बाद ठीक उसी दिन तीन दिसंबर को सुबह चार बजे बाबूजी ने अंतिम सांस ली थी। अपने पिता को याद करते हुए उन्हें अपनी भावांजलि दे रही है उनकी बेटी वंदना दुबे।

54.In Memory of My Father-पिताजी भोपाल गैस त्रासदी से बाल बाल बचे थे ,बस छूट गई थी उनसे !

वंदना दुबे
शास्त्रों के माध्यम से जीवन मूल्य, भाषा ज्ञान, स्मरण शक्ति का विकास और अध्ययन में रुचि विकसित करने की प्रथम पाठशाला घर ही होता है ।शाम को दिया बत्ती के समय नियम से माँ बाबूजी और हम पाँचो भाई बहन,श्लोक आरती और मंत्र पुष्पांजलि उच्च स्वर में गाते ।परिणामस्वरूप हमें अनेकों श्लोक, स्तोत्र, पाठ और आरतियाँ कंठस्थ हो गईं ।संस्कृत और हिन्दी शब्दों के शुद्ध उच्चारण पर बाबूजी का विशेष जोर होता। गलत उच्चारण पर वे तुरंत टोकते।

माँ इंदौर की थी, हम सब जबलपुर में पले बढ़े, तो मालवी और बुंदेली दोनों बोलियों से अच्छी तरह परिचित थे, पर चूँकि बाबूजी संस्कृत और हिन्दी के अच्छे जानकार थे, अतः बोलियों की अशुद्धता उन्हें कतई पसंद नहीं थी। वे हमेशा  हिन्दी के शुद्ध प्रयोग के पक्षधर रहे। शायद यही वजह है कि हम भाई बहनों ने हिन्दी वर्तनी संबंधी अशुद्धि लगभग नहीं की ।

बाबूजी के व्यक्तित्व में  जितना संस्कृत भाषा का  प्रभाव दिखता था उतना ही अंग्रेजी का भी। दरअसल संस्कृत का ज्ञान उन्हें अंग्रेजी के द्वारा  ही प्राप्त हुआ ।उनके एक महाराष्ट्रियन मित्र थे। कविश्वर काका गीता प्रचार केंद्र के संस्थापक थे। उन्होंने बाबूजी को एक संस्कृत-टू-इंग्लिश गीता  भेंट की। अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से संस्कृत श्लोकों का अर्थ समझना बाबूजी को बड़ा रुचिकर लगा।इससे दो फायदे हुए एक तो संस्कृत समझने में मदद मिली और संस्कृत पर उनका  कमान्ड हो गया।दूसरा- उन्होंने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया कि संस्कृत से अनुवाद करते समय, हिन्दी में जो उपयुक्त शब्द प्राप्त हैं, वह अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं।इस प्रकार तीन भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन बाबूजी का शौक, और बाद में उपलब्धि  बन गया।

एक बार यात्रा के दौरान  बुक स्टाॅल से वे एक ज्योतिष की किताब खरीद लाए। अब चूंकि संस्कृत उनके लिए आसान थी इसलिए ज्योतिष सीखना और सरल हो गया। वे हमेशा कहते ज्योतिष गणनाओं पर आधारित है। यदि गणित अच्छा है तो ज्योतिष सीखना आसान  है। बाद में तो उनकी अल्मारी में ज्योतिष की कई किताबें थीं।
विद्वान व्यक्तियों को भोजन का निमंत्रण देकर  उनके साथ ज्यादा समय विभिन्न विषयों के साथ, शास्त्रों तथा ज्योतिष पर चर्चा करना उन्हें अच्छा लगता। संस्कृत श्लोकों के साथ ही अंग्रेजी में ज्योतिष को एक्सप्लेन कर, वे सबको चौंका देते।

बाबूजी ने हमें सिखाया कि किस तरह संस्कृत के बड़े शब्दों का संधि विच्छेद करके उनका उच्चारण और अर्थ  सुगम किया जा सकता है।

बाबूजी भग्वतद्गीता से इतने प्रभावित थे कि हर समय उसका अध्ययन और मनन करते। परंपरा के नाम पर,बेमन से  देव-पूजा और पाठ के, वो कभी समर्थक नहीं रहे। गीता के अध्ययन और विश्लेषण द्वारा वे  कृष्णभक्ति का महत्व समझाते।

इतना तो कहूँगी, कि वर्षों  पहले मेरे बाबूजी,विचारों  से आधुनिक थे। जब तक तर्क की कसौटी पर किसी बात को सही न मान लेते तब तक उसे स्वीकार नहीं करते। व्यर्थ की रूढ़ी और परंपराओं में उनका विश्वास नहीं था ।

बचपन से हमने घर में अध्ययन का वातावरण देखा था। घर में सुबह सभी को अखबार की प्रतीक्षा रहती। बल्कि अखबार सबसे पहले पा लेने और पढ़ने की होड़ भी। इसलिए घर में दो अखबार आने लगे थे। बाबूजी का फ्रंट पेज के समाचार पर ज्यादा जोर होता ।माँ भी सुसंस्कृत,  शिक्षित और कार्यकुशल महिला थी। दोपहर को काम से निवृत्त होकर नियम से पूरा अखबार पढना माँ की दिनचर्या में शामिल था।

बाबूजी ने ब्रिटिश काल देखा था इसलिए वो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते थे। अध्ययन के दौरान जब हम डिक्शनरी में  किसी अंग्रेजी शब्द का मायना खोजते तो बाबूजी तुरंत पूछते- कौन-सा वर्ड देख रहे ही बेटा ? और उस शब्द के  कई समानार्थी शब्द यहाँ तक कि विरोधी शब्द भी बता देते।

हमारे बड़े पिता जी पोलिस प्रासीक्यूटर थे उन्होने हमेशा बाबूजी को अपने साथ रखा। जहाँ भी ट्रांस्फर होता बाबूजी साथ रहते। बाबूजी की शिक्षा, नौकरी, विवाह आदि कर्तव्य उन्होंने अपना बेटा समझ कर ही निभाए। यद्यपि बाबूजी ने वकालात नहीं की थी, पर बड़े पिताजी से कानून के गुर सीखे। कई लोग बाबूजी से सलाह मशविरा करते थे  बाबूजी की ड्राफ्टिंग इतनी लाजवाब होती, कि जज भी तारीफ करने से खुद को रोक न पाते।

घर में कार्य के प्रति कड़ा अनुशासन था। संयमित आचरण और समय की पाबंदी पर विशेष जोर था । बावजूद इसके बाबूजी के व्यवहार में हास्य विनोद का पुट देखने मिल जाता  था। अपने वाक चातुर्य से  बाबूजी छोटा हो या बड़ा सभी को प्रभावित कर लेते थे। वे किसी व्यक्ति की दुर्भावना को तुरंत ताड़ लेते थे इसलिए हमेशा यह सीख देते कि गाफ़िल मत रहो,चौकस रहो ।

बाबूजी ऑर्डनेंस फैक्ट्री में एयर फोर्स डिपार्टमेंट में जिम्मेदार पद पर थे । उस समय प्रमोशन के बेस पर उन्हें कई बार विदेश जाने के अवसर मिले पर परिवार को छोड़ कर जाना उन्होंने मान्य नहीं किया ।काम के प्रति वे बहुत कड़क और ईमानदार थे । उनकी देखरेख में ही बमों की टेस्टिंग होती ।बाबूजी तभी उन्हें पास होने देते, जब सभी मानकों पर बम ठीक होते वर्ना पूरा लाॅट रिजेक्ट हो जाता ।

एयरफोर्स के विंग कमांडर, ग्रुप कैप्टन और स्वाॅडन लीडर रैंक के अधिकारियों को भी बाबूजी की कार्यकुशलता और ईमानदारी पर बहुत भरोसा था ।सेक्शन में प्रविष्ट होते ही वे सबसे पहले बाबूजी से मिलकर पूरी जानकारी लेते तथा उनके काम से पूर्ण संतुष्ट होते ।बाबूजी के मुख से ये बाते सुनकर हमें भी गर्व की अनुभूति होती ।

मृत्यु के अंतिम पल तक मनुष्य सीखता ही है. बाबूजी इसका प्रत्यक्ष  उदाहरण थे। जीवन के अंतिम समय तक वे  अध्ययन कर रहे थे।91 वर्ष की आयु में मृत्यु की सुबह उन्होने  धूप में बैठकर पूरा अखबार पढ़ा था।,एक किस्सा उनकी मृत्यू और भोपाल गैस त्रासदी की बरसी से जुड़ा हुआ है हुआ यूँ कि1984 नवंबर के अंतिम सप्ताह में बाबूजी किसी कार्य वश इंदौर गए हुए थे। भोपाल गैस काण्ड के एक दिन पूर्व ही उनका पत्र मिला।

कार्य पूर्ण होने की जानकारी देते हुए उन्होंने भी लिखा था, कि भोपाल में एक दो दिन रुक कर लौटूंगा।
गैस काण्ड की खबर पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गई थी।पुराना भोपाल ज़हरीली गैस का सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र था।
हम सभी बहुत घबराए हुए थे; क्योंकि बाबूजी का जब भी भोपाल जाना होता तो वो अपनी भतीजे रुईकर भैय्या के यहां ठहरते और उन दिनों रुईकर भैय्या का निवास पुराने भोपाल में ही था।हम सभी बहुत घबरा रहे थे, कैसे उनकी सूचना मिले ?दो दिन बाद देखते क्या हैं कि बाबूजी कंधे पर बैग टांगे चले आ रहे हैं। आश्चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं था।जाको राखे साइयां मार सके ना कोय। कहावत को चरितार्थ होते देखा।
फिर बाबूजी ने जो किस्सा सुनाया, वह सचमुच अद्भुत था ।दरअसल बाबूजी दो दिसंबर को इंदौर बस स्टैंड पर खड़ी भोपाल बस में चढ़ने से पहले पान लेने को मुड़े । पान लेकर वे बस में जाकर बैठ गए।बस जब इंदौर से बाहर हो गई तब कंडक्टर टिकट काटने आया। बाबूजी ने उससे भोपाल का किराया पूछा।”यह बस तो मंदसौर जा रही है।”अरे! बाबूजी आश्चर्य चकित थेचलो ठीक है। पशुपतिनाथ के दर्शन ही कर लेंगे ।बाबूजी ने पशुपतिनाथ के दर्शन का मन बना कर कंडक्टर से मंदसौर का टिकट कटा लिया।दरअसल जब बाबूजी पान ले रहे थे उस बीच भोपाल बस निकल गई और उसकी जगह मंदसौर बस लग गई ।चूंकि बाबूजी पहले ही भोपाल बस की जानकारी ले चुके थे इसलिए उन्हें बस में सिर्फ जाकर बैठना ही था पर किस्मत से उस दिन वह पांच मिनट पहले ही छूट गई थी।
शायद उस समय बाबूजी की आयु शेष थी इसलिए ईश्वर कृपा ने उन्हें भोपाल से विपरीत दिशा में पहुंचा दिया।
उस घटना के इकतिस साल बाद ठीक उसी दिन तीन दिसंबर को  सुबह चार बजे बाबूजी ने अंतिम सांस ली।

माता-पिता की शिक्षा ने हम भाई बहनों के जीवन में भी गहरे तक अध्ययन के बीज बो दिये थे; तभी तो आज भी टेबल पर रखी उनकी किताबों की रेखांकित पंक्तियों की तरह हमारे मन में भी उनकी शिक्षा संबंधी  स्मृतियां यथावत बनी हुई हैं ।

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-वंदना दुबे, धार

शिक्षा-स्नातकोत्तर ( हिंदी साहित्य, संगीत एवं अर्थ शास्त्र में)एवं बीएड,लगभग पच्चीस वर्ष व्याख्याता पद पर कार्यरत रही

देश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित ।मुंबई में बेस्ट लेक्चरर अवार्ड से सम्मानित।

तीन निजी पुस्तकें प्रकाशित ,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता एवं आलेखों का प्रकाशन। विभिन्न सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध ।आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर गीत एवं काव्य पाठ प्रसारित।

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