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सुनो! मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी “मैं वट-वृक्ष “

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सुनो ! मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी “मैं वट-वृक्ष “

डॉ अंजलि मिश्रा

एक बरगद का विशाल पेड
इस धरती पर जब यह धरती जवान खुशनुमा थी

तब इस धरती पर मेरा जन्म हुआ उजली धरती स्वस्थ हवा

स्वस्थ पानी और धरती की उपजाऊ मिट्टी से

मै धीरे धीरे बड़ा होता गया।मेरी अनेक भुजाएँ थी .

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मेरी अनेक भुजाओं की घनी छाया मे इंसान को बड़ा सकून मिलता था

मेरी उम्र का मुझको ही पता नही मै भूल ही गया की मै कब पैदा हुआ।

कई युग बीत गए लेकिन जब साधन नही थे तब इंसानो की इस दुनिया में ,

मैं भी  अमन चैन से रहता था. मुझे शुद्ध हवा मिलती थी और मेरी घनी छाव मे,

इंसान मेरे विशाल भुजाओं मे आंधी, बरसात तूफान मे महफूज रहते थे.

फिर इंसानी दुनिया मे आया आधुनिकता का विकास दोर,

और इस दोर मे मेरे अनेक साथीअपनी जवान हरियाली के साथ काट दिये गये.

मार दिये गए क्योंकि ,

आज के इंसान को हरियाली की जगह मकानों के जंगल जो खड़े करना थे.
जब जब मुझे मारा लेकिन तब भी , वो मेरा अस्तित्व नही मिटा सके.

मुझे सब और से काट दिया गया मुझे ठूठ के रूप मे खड़ा कर दिया,
लेकिन एक दिन जब मेरी सखी बरसात,आ पंहुची मेरे द्वार ,

दुखी हो  झम झम करती बूँदों के साथ  मुझ पर बरसी.
उन बूँदों से मेरी प्यास और हृदय की अग्नि बुझा दी
और

मेरे अंदर मुझे लगा कि, अरे अभी मुझमे कंही बाकी थोड़ी सी है जान
जगी धड़कन नयी ,माना जिंदा हूँ मै तो अभी
और इसी एक लम्हे मे मेरी जिंदगी ने फिर से ली अंगड़ाई.

और फिर इस धरती ने मेरे अंदर एक नन्हे सी एक नई कोपल उगाई
जो मेरे थके तन और थके मन को देख कर मुस्कुराई
बोली मत हो उदास
तुझमें  जान अभी बाकी है
और यही मेरे बचपन से जवानी
और फिर बुढ़ापे से बचपन तक जाने की कहानी है।।

इंदौर लेखिका संघ की चित्र आधारित लेखन कार्यशाला की कुछ रचनाएं