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फ्लैग प्वाइंट..जहां समंदर की लहरें देती हैं तिरंगे को सलामी!!

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फ्लैग प्वाइंट..जहां समंदर की लहरें देती हैं तिरंगे को सलामी!!

-संजीव शर्मा

तिरंगा धीरे धीरे…लेकिन मजबूती के साथ ऊपर उठ रहा था और इसके साथ-साथ सैकड़ों लोगों की आशाएं, उम्मीदें और आजादी की आकांक्षा समंदर की उछाल मारती लहरों के साथ जयघोष कर रहीं थीं । ऐसा लग रहा था जैसे कोई सपना हकीकत में बदल रहा हो और समंदर स्वयं इस बात का साक्षी बन रहा हो। तिरंगा में सबसे पहले केसरिया रंग ने सूरज की किरणों के साथ आंख से आंख मिलाकर विजय का शंखनाद किया। फिर, सफेद रंग ने सत्य की ताक़त का संदेश दिया और अंत में हरे रंग ने हरे भरे द्वीप से यह स्पष्ट कर दी कि-‘अब यह धरती हमारी है।’

 

हम बात कर रहे हैं 30 दिसंबर 1943 की…वह दिन, जो आज भी हमारी आजादी के लोकतांत्रिक पटल पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। जब तिरंगा ध्वज स्तंभ (फ्लैग पोल) के शिखर पर पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे सैकड़ों साल की गुलामी की जंजीरें एक साथ टूट गई हों। भारत को मिली स्वतंत्रता से करीब चार पहले तिरंगा फहराकर आजादी का ऐलान करने वाले शख़्स थे – नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्थान था-अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की मौजूदा राजधानी पोर्ट ब्लेयर, जिसे अब हम श्री विजयपुरम के नाम से जानते हैं ।

यह ऐतिहासिक घटना देश के स्वतंत्रता संग्राम में मील का वह पत्थर साबित हुई जिसने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया..जहां तक नेताजी की बात है तो वे पहले ही भारतीय जनमानस को आश्वस्त कर चुके थे कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..पोर्ट ब्लेयर से तिरंगे के जरिए दुनिया भर को दिया गया यह पैगाम इसी नारे का विस्तार था।

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दरअसल,पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना ग्राउंड (जो आज नेताजी स्टेडियम कहलाता है) में तब तक ब्रिटिश यूनियन जैक लहराता था लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराकर गुलामी के पन्ने को पलटकर आजादी का जयघोष लिख दिया। नेताजी के इस कदम ने अंडमान को देश का ऐसा पहला हिस्सा बना दिया था जिसे सबसे पहले स्वतंत्र घोषित किया गया।

हाल ही में, मीडिया के साथियों के साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की यात्रा के दौरान मुझे इस पवित्र स्थल के दर्शन का सुअवसर मिला। यह किसी ‘राष्ट्रतीर्थ’ से कम नहीं है। 1943 की उस ऐतिहासिक तिथि को यादगार बनाने के लिए यहां स्मारक बनाया गया है। यह स्थान अब पोर्ट ब्लेयर में फ्लैग पॉइंट (तिरंगा मेमोरियल) के नाम से जाना जाता है। यहां अब 150 फीट ऊंचा तिरंगा ध्वज लहरा रहा है और पास में ही स्थित समुद्र की अठखेलियां करती लहरें अपने शोर के साथ हमारी स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए वीरों का जयगान करती हैं।

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फ्लैग प्वाइंट में नेताजी की स्मृति में बना स्मारक भी है जिस पर उनकी तस्वीर के साथ ध्वजारोहण की उस स्वर्णिम घटना का विवरण दर्ज है। स्मारक पर लिखा है: “30 दिसम्बर सभी भारतीयों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज और आज़ाद हिन्द की अंतरिम सरकार के सहकर्मियों के साथ पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया था। इसके साथ ही उन्होंने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्रिटिश राज से आज़ाद होने वाला पहला भारतीय भू-भाग घोषित किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की शाही सेना यहाँ 23 मार्च, 1943 से ही पदस्थापित थी । 6 नवम्बर, 1943 को जापान के प्रधानमंत्री ने टोक्यो में ग्रेटर ईस्ट एशियाटिक नेशन्स की सभा में यह घोषणा की थी कि अंडमान एवं निकोबार प्रायद्वीप को आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार को सौंप दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि नेताजी आजाद हिन्द फोन के सर्वोच्च सेनापति थे और आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार के मुखिया भी थे ।”

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यहाँ से रॉस द्वीप (Ross Island), नॉर्थ बे (North Bay) और समुद्र का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है। पर्यटकों के साथ साथ स्थानीय लोगों के समुद्र के किनारे टहलने और बैठने की व्यवस्था भी है एवं एक खूबसूरत पार्क भी, जो यहां के वातावरण को और सुंदर बना रहा है । सूर्यास्त के समय तिरंगे के साथ तस्वीरें लेने के लिए यह एक बेहतरीन जगह है।

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हालांकि, व्यस्तता एवं समय की कमी के कारण हम (मैं और दैनिक भास्कर शिमला के न्यूज़ एडीटर रविंदर कुमार पनवर) रात को करीब 9 बजे यहां पहुंच पाए लेकिन तब भी यहां का माहौल,लोगों की उपस्थिति और आकर्षक लाइटिंग इसे अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। यहां पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे आज भी, पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्रीय ध्वज के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वंदे मातरम् का जयघोष समुद्र की गड़गड़ाहट के साथ हवा में व्याप्त है।