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मानवता और विकास पर नरसंहार और विनाश के तांडव का प्रतीक बन गया रूस-यूक्रेन युद्ध …

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21 वीं सदी और रूस-यूक्रेन युद्ध… शायद संकेत बड़े अशुभ हैं। 44 दिन तक युद्ध जारी है। रूस जैसी महाशक्ति-परमाणु शक्ति अपने पड़ोसी देश यूक्रेन के शहरों का विनाश कर रही है। नागरिकों का नरसंहार हो रहा है। नागरिकों को लाशों को भी सम्मान से दफन करने की मोहलत नहीं मिल रही है।
यूक्रेन दु:खों के अंधेरे में डूबा है और दुनिया के देश इस वीभत्सता से मुंह मोड़कर इस चीरहरण के मौन साक्षी बन रहे हैं, ताकि उनका अमन-चैन कायम रह सके। पर बड़ा सवाल यह है कि जब मानवता और विकास पर नरसंहार और विनाश के तांडव का फूहड़ प्रदर्शन सरेआम हो रहा है और सब मौन हैं, तब क्या बारी-बारी सभी कमजोर देशों को एक न एक दिन इसी अमानवीयता का शिकार होना पड़ेगा? फिर भी बर्बादी की कगार पर तो अमानुषिक अत्याचार करने वाला भी खड़ा होगा यानि कि मानवता तो गहन पीड़ा का त्रास झेलने को मजबूर होगी ही?
यूक्रेन में शहर दर शहर तबाही का मंजर है। कीव हो या खारकीव चेर्निहीव हो या बूचा और सूमी…शहर तबाह होने को मजबूर हैं तो मानवीयता का गला घोंटा जा रहा है। बच्चे, जवान, बूढ़े सभी इस अमानवीयता के शिकार हो रहे हैं और दुनिया के दूसरे देश अपनी आबरू उस दिन तक बचाने के लिए मौन बैठे हैं, जब उनके देश के नागरिक भी इसी तरह की परिस्थितियों का शिकार होंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ बेबस और लाचार हो निर्वस्त्र हो चुका है। आर्थिक-व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर रूस के हाथ बांधने की हास्यास्पद कोशिश के चलते पूरी दुनिया कॉमेडी बनी दिख रही है।
दर्द भरे गीत यूक्रेन की फिजाओं में तैर रहे हैं, तो बाकी दुनिया कुछ शुरुआती दिनों का रंज मनाकर अब अपनी मस्ती में डूबी हुई है। मनोरंजन के तौर पर चैनल बदलकर या इंटरनेट पर रूस-यूक्रेन युद्ध की खबर पढ़कर मन बहला रही है। पर समय कभी माफ नहीं करता। युद्ध सभी पक्षों को दर्द दिए बिना विदा नहीं होता और परोक्ष व अपरोक्ष तौर पर दुनिया के सभी देश इसका परिणाम भुगते बिना नहीं बच पाते। 21 वी सदी के आने वाले साल उन दृश्यों के साक्षी बनेंगे, जब इस मौन का भुगतान बाकी देश कर रहे होंगे। आज गोरी चमड़ी वाले स्क्रीन पर हैं, तो कल काली चमड़ी वाले मैदान में खेत नजर आएंगे। आज हम मौन हैं, तो कल कोई और चुप्पी साधे बैठा होगा।